क्यूं ना बादलों को पकड़ा जाए,
आसमानों में बाधा जाए,
हवाओं को मोड़ा जाए ,
सवाल बेख्याल हो कर किया जाए
,
,
आज एक सवाल उनसे कम ना पूछा जाए,
चलिए एक घूंट गम का यूंही लिया जाए
जो हमारी सांसों के जबरदस्ती मालिकान हैं,
हावाओं के मुख मोड़ने वाले खुदी में ताजदार है
चलिए आइना ही बना जाए,
जिनके हम और तुम बिन कहे कर्जदार हैं
मुश्किल है पर ,
क्यूं ना आज सिस्टम से ही सवाल पूछा जाए
इस ख़ामोशी को तोड से ऐसी एक आवाज़ लाई जाए
चट्टानों से ही सही कुछ
बात बोली जाए
बात हमेशा पते कि हो ऐसा क्यूं
कुछ सवाल के पेट के लिए ही पूछा जाए
इन्हें मक्कारी या फिर बेईमानी हि समझा जाए
सवाल डरकर ही सही मसनदे आका से क्यूं ना किया जाए
आसान नहीं था खुद को भी तो समझाना
न्याय नहीं था चट्टानों से बातें करना
आसान नहीं था भावनाओं का समेटा जाना
हुज़ूर से आगे निकला जाए
हुकूमत का हुक्म ना माना जाएं
तो क्या मुझे बर्बाद कर दिया जाएगा
मेरे आशियाने को तबाह कर दिया जाएगा
तो क्या मुझे गैर मजहबी मांन लिया जाएगा
तो क्या मुझे दरकिनार कर दिया जाएगा
तो क्या मेरे सवालों को मेरे साथ नाजायज कह दिया जाएगा